बिना डिस्क्लेमर की पद्मावत

बिना डिस्क्लेमर की पद्मावत

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आपने ये ठीक नहीं किया जायसी साहब। हिंदुस्तान में पहले से ही कम झगड़े थे जो आपने पद्मावत लिखकर एक और मुद्दा दे दिया झगड़ने के लिए। अतीत के इतने सारे विवाद पहले ही हमारी गर्दन पर सवार हैं। हम हर दिन इतिहास पर धींगमुश्ती करते रहते हैं। हमें उनसे ही फुरसत नहीं मिल पाती और आपने हमें व्यस्त रखने के लिए एक और मसला थमा दिया। कृपया बताइए कि आख़िर क्या ज़रूरत थी आपको पद्मावत लिखने की?

अब ये मत कहिएगा कि आपको पता नहीं था कि पाँच सौ साल बाद का भारतीय समाज इतना मतिहीन, इतना रूढ़िवादी और इतना घृणा-प्रेमी होगा कि आपके काव्य का रसास्वादन करने के बजाय उसके आधार पर लट्ठ बजाने पर आमादा हो जाएगा। आप इतने बड़े कवि थे तो इसका अंदाज़ा रखना भी आपकी जिम्मेदारी बनती है कि भविष्य में लोग अतीत के नाम पर लड़ सकते हैं, मरने-मारने पर उतारू हो सकते हैं। आप ये कहकर भी नहीं बच सकते कि आपने ऐसे संचार-साधनों की कल्पना भी नहीं की थी जो लोगों को उकसाने और लड़ाने की जुगत में ही लगे रहेंगे, वे किसी काव्य, किसी उपन्यास को इतिहास मान लेंगे और किसी समाज के मिथ्या जातीय गौरव को उभारकर फसल काटने में जुट जाएँगे। ये बचकाना तर्क भी नहीं चलेगा कि लोग पद्मावत का राजनीतिक इस्तेमाल कर रहे हैं। ग़लती आपकी है। आपने मौक़ा दिया है उन्हें और यहाँ लोग तो मौक़े की तलाश में ही रहते हैं। वे क्यों चूकते भला?

अव्वल तो आपको इतना संवेदनशील विषय उठाने की ही क्या ज़रूरत थी? अच्छा-खासा भक्तिकाल चल रहा था और आप सूफी तबीयत के आदमी भी थे। क्या ये बेहतर नहीं होता कि दूसरे कवियों की तरह कोई भक्ति रचना लिखते? हाँ, हाँ मुझे पता है कि आपने वे भी लिखी हैं, मगर मेरा ऐतराज़ तो पद्मावत को लेकर है न। वह आपने क्यों लिखी? लिखने के पहले आपको सोचना चाहिए था कि आप हिंदू राजा और मुसलमान बादशाह को एक सुंदरी के लिए लड़वा रहे हैं और इसके नतीजे बेहद घातक हो सकते हैं। ये मामला दो राजाओं के स्वार्थों की लड़ाई का था। उन्हें अपने राज्यों का विस्तार भी करना था और दुनिया की बेहतरीन चीज़ें भी हासिल करनी थीं, इसलिए वे आपस में लड़े। मगर आपने उसमें ऐसा मसाला लगाया कि जंग एक मुसलमान द्वारा एक हिंदू रानी को अपनी बीवी बनाने के अभियान में तब्दील हो गई। आपने तो उत्साह में लिख मारा और आपको वाहवाही भी खूब मिली। यहाँ तक कि आपकी रचना कोर्स में भी पढ़ाई जाने लगी। ठीक है ठीक है आपको रॉयल्टी नहीं मिली मगर आप सोचिए न कि देश के सेकुलर और लोकतांत्रिक ढाँचे के लिए वह कितनी महँगी साबित हो रही है।

जायसी साहब, आपने तो एक किस्से को काव्य में बाँध दिया, अपनी कल्पनाशीलता से उसे मनोरंजक भी बना दिया। आपने ये भी सोच लिया होगा कि इक्कीसवीं सदी का मनुष्य उसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण से पढ़ेगा। आपने मान लिया होगा कि आधुनिककाल का मनुष्य इतना तो समझ ही लेगा कि वेद पढ़ने वाला और मनुष्यों की ज़ुबान में बोलने वाला हीरामन तोता तो कहीं पाया नहीं जाता। न ही किसी सिंहल द्वीप की कोई ऐसी राजकुमारी थी, जिसके रूप-सौंदर्य का वर्णन किसी तोते से सुनकर ही राजा आपस में लड़ने-लड़ाने पर आमादा हो जाएंगे। आपने तो दो सौ साल पुरानी घटनाओं के बारे में जो सुनी-सुनाई आधी-अधूरी जानकारी मिली उसी को आधार बनाकर पद्मावत की रचना कर दी। लेकिन आपने इस सचाई को नज़रंदाज़ कर दिया कि जिस देश में मिथकों, पुराणों और कथा-कहानियों को ही इतिहास मानने की आत्मघाती परंपरा है, वहाँ पद्मावत भी इसी काम आएगी। हुआ भी यही। कर्णी सभा के राजपूत भी उसी काल्पनिक इतिहास-गौरव में डूबे हुए हैं, बल्कि उसके आधार पर मरने-मारने पर उतारू हैं। एक फिल्म से वे इतना घबरा जाते हैं कि उन्हें अपना “गौरवशाली अतीत” ख़तरे में दिखने लगता है। एक पद्मावती को लेकर उनमें इतना उबाल आ जाता है मगर उन हज़ारों पद्मावतियों को चिंता नहीं होती, जिन्हें जन्म लेने से पहले ही मार दिया जाता है। उन पद्मावतियों की वे बात नहीं करते जो घुट-घुटकर जी रही हैं, अत्याचार और अनाचार का शिकार हो रही हैं। ज़ाहिर है कि ऐसे राजपूतों को भ्रमित करने का दोष तो आपका है और आप इससे बच नहीं सकते।

और तो और आपने इतनी सावधानी भी ज़रूरी नहीं समझी कि कम से कम एक डिसक्लेमर ही लगा देते। पहले पन्ने पर लिख देते कि इस रचना में वर्णित काल-पात्र एवं स्थान आदि काल्पनिक हैं, उनका वास्तविकता से कुछ भी लेना-देना नहीं है और संयोगवश कोई समानता दिखती है तो उसके लिए आप ज़िम्मेदार नहीं हैं। ये भी कि अगर किसी की भावनाएं आहत होती हैं तो आप उसके लिए खेद प्रकट करते हैं। आपको लेखकीय ज़िम्मेदारी का एहसास होता तो आप ऐसी लापरवाही हरगिज़ नहीं करते। आपने मीडिया की तरह ही बर्ताव किया है। वह भी अपने किए की कभी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेता और न ही कोई खेद प्रकट करता है।

डॉ. मुकेश कुमार

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